- क्यों सीधे चीन से टक्कर नहीं ले रहा अमेरिका? जानें वजह | सच्चाईयाँ न्यूज़

सोमवार, 7 अगस्त 2023

क्यों सीधे चीन से टक्कर नहीं ले रहा अमेरिका? जानें वजह

क्यों सीधे चीन से टक्कर नहीं ले रहा अमेरिका? जानें वजह

चीन और अमेरिका के रिश्तों में लंबे समय से चली आ रही खटास दुनिया से छिपी नहीं है, लेकिन दोनों सीधे आमने-सामने नहीं आते. ये दोनों देश अन्य देशों से सहारे अपने हितों सो साधते हैं. अमेरिका, ताइवान, भारत, आस्ट्रेलिया, जापान जैसे देशों का सहारा तो लेता ही है.

वहीं छोटे-छोटे समुद्री देशों से दोस्ती बनाने में भी उस्ताद है. चीन-अमेरिका की रंजिश को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है इन दोनों का रिश्ता कितना पुराना है और अब दोनों के बीच इतनी तल्खी क्यों आ रही है.

चीन-अमेरिका का रिश्ता औपचारिक तौर पर पहली दफा 239 वर्ष पूर्व साल 1784 में बना, जब पहला जहाज अमेरिका से चीन के ग्वांगजाओ प्रांत पहुंचा. तभी से दोनों देशों के बीच व्यापार शुरू हुआ. साल 1830 में अमेरिकी पादरी चीन पहुंचे और उन्होंने ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार शुरू किया. इस दल ने चीन के इतिहास, संस्कृति आदि को समझा और अमेरिका के इतिहास आदि के बारे में चीनी भाषा में लिखने का काम किया. साल 1847 के आसपास चीनी श्रमिक अमेरिका पहुंचने लगे.

इन्हें खदान और रेल पटरी बिछाने जैसे काम मिले. वह जो सिलसिला शुरू हुआ तो आज अमेरिका में चीन की आबादी 40 लाख से ऊपर बताई जाती है. साल 1850 से 1905 के बीच दोनों देशों के रिश्तों में अनेक उतार-चढ़ाव आए. व्यापार में वृद्धि भी होती रही. समझौते भी हुए और दोनों ने एक-दूसरे को आंखें भी खूब दिखाई. नागरिकों पर प्रतिबंध भी लगे.

युद्ध में अमेरिका के साथ रहा चीन

चीन में साम्राज्यवाद के पतन के बाद रिश्ते फिर परवान चढ़े और अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन के कहने पर चीन ने साल 1919 के विश्व युद्ध में मित्र देशों का साथ दिया. उसे लालच थी कि जर्मनी में व्यापार बढ़ाने का मौका मिलेगा. हालांकि ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि जापान, ब्रिटेन और फ्रांस ने कुछ समझौते कर रखे थे आर इसकी जानकारी भी चीन को नहीं दी गई या यूं भी कह सकते हैं कि नहीं मिल पाई. इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी देखी गई. चीन में अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन तक हुए. साल 1921 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापन हुई फिर कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग ने पीपुल रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की. इनके विरोधी थे चियांग काई शेक. शेक और तुंग के बीच लड़ाई में अमेरिका ने शेक का साथ दिया और उधर तुंग सत्ता में आ गए. फिर दोनों के रिश्तों में कड़वाहट बनी ही रही.

ताइवान के मुद्दे पर दोनों हुए आमने-सामने

कालांतर में सोवियत संघ के समर्थन वाली उत्तर कोरियाई सेना ने दक्षिण कोरिया पर हमला किया. इसमें संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने दक्षिण कोरिया का साथ दिया जबकि चीन ने उत्तर कोरिया का साथ दिया. यह युद्ध बेनतीजा रहा. इस बीच 1953 में चीन, संयुक्त राष्ट्र संघ और उत्तर कोरिया के बीच युद्ध विराम का समझौता हो गया. इस लड़ाई में अमेरिका के 40 हजार सैनिक मारे गए. दोनों के रिश्ते में फिर कड़वाहट आ गई. ताइवान के मुद्दे पर फिर दोनों आमने-सामने आए. अमेरिका ने परमाणु हमले तक की धमकी दे दी. यह साल 1954 की बात है. उस समय चीन शांत हो गया, लेकिन साल 1964 में उसने पहली बार परमाणु परीक्षण करके अपने इरादे जाहिर कर दिए. इस बीच चीन-रूस आमने-सामने आ गए. इनमें झड़पें शुरू हो गईं. तब चीन ने रूस को दुश्मन मानते हुए अमेरिका से नजदीकी बढ़ा ली.

भारत से दोस्ती, लेकिन चीन से जारी रहा व्यापार

साल 1972 में अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन चीन गए और आठ दिन रुककर रिश्ते को नई ऊंचाई दी. दोनों देशों में समझौते हुए और रिश्तों की एक नई शुरुआत हुई. दोनों ने एक-दूसरे से फायदे लिए. अब सोवियत रूस दोनों का दुश्मन हो गया. 1980 का दशक रिश्तों को और आगे ले गया. यहां तक कि अमेरिका ने ताइवान से भी अपने हाथ खींच लिए और दोनों देशों में व्यापार बढ़ने लगे. अंतर्राष्ट्रीय छवि सुधारने को चीन ने 90 के दशक में कई बदलाव किए. हांगकांग और ताइवान को उसने अलग अर्थव्यवस्था के रूप में स्वीकार कर लिया.

बिल क्लिंकटन जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो दोनों के रिश्ते फिर परवान चढ़े. कई तरह की शुरुआत हुई. कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने चीन के अनेक कदम की अनदेखी की, लेकिन बुश और ओबामा ने ऐसा नहीं किया बल्कि यह माना कि इंडो पैसिफिक में शक्ति संतुलन बिगड़ रहा है और चीन इसका सीधा फायदा उठा रहा है. अमेरिका ने भारत के साथ रिश्ते को मजबूती देने का मन बनाया लेकिन चीन से व्यापारिक रिश्ते पर रोक नहीं लगा सका.

चीन ने ऐसे अपने आप को किया मजबूत

अमेरिका सोचता रहा है कि वह बड़ी अर्थव्यवस्था है तो दुनिया पर राज करेगा. चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग ने तय किया कि हमारे पास बाजार है. श्रम शक्ति है. दुनिया के सामने हम ताकत हैं और बने रहेंगे. जिनपिंग ने सरकारी से लेकर निजी संस्थानों में अपनी पार्टी कि इकाई गठित कर दी है. वह फैसले करती है. उसी अनुरूप काम होता है. यह अमेरिका को पसंद नहीं है. उसने लोकतंत्र कि बात उठाई. चीन कि सरकार ने अपने लोगों को सम्पन्न बनाया और यह बात पुख्ता कर दी कि जहां लोकतंत्र है वहां कौन सी अमीरी छा गई है. चीन ने गांव से लेकर शहरों तक सुविधाएं दी. अपनों का जीवन स्तर उठाने पर काम किया. बस उनसे यह कह दिया कि राजनीतिक अधिकार नहीं मांगना है. अगर कहीं से कोई आवाज उठी भी तो उसे दबा दिया गया.

अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है चीन

आज अमेरिका चीन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है. इसलिए वह चीनी प्रभाव को कम करने को भारत का सहारा लेता है तो पाकिस्तान को साथ लेना नहीं भूलता. हाल ही में उसने पाकिस्तान के साथ अपने सैन्य समझौते को नया आयाम दिया है. वियतनाम के सिर पर अमेरिका ने फिर हाथ रख दिया है. भारत, ताइवान जैसे देश अपने स्वार्थ में उसकी सुन रहे हैं.

उभरती हुई अर्थव्ययवस्था होने के कारण भारत के सामने चीन एक चुनौती के रूप में खड़ा है. ऐसे में भारत को भी साथ चाहिए. इसलिए वह क्वाड के साथ है. अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देश अब भारत की ओर उम्मीदों से देख रहे हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका डेढ़ साल से ज्यादा समय से यूक्रेन की लगातार मदद कर रहा है, लेकिन उसे यह पता चल चुका है कि लड़ाई किसी समस्या का हल नहीं है. ऐसे में चीन से दूरी बनाने के बावजूद अमेरिका कोई सीधी लड़ाई मोल नहीं लेना चाहता. वह दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर ही चीन से कूटनीतिक तौर पर लड़ता रहता है.

एक टिप्पणी भेजें

Whatsapp Button works on Mobile Device only

Start typing and press Enter to search