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बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

बिखरी लाशें, जलते मकान, बस्ती के बीच बारूद की फैक्ट्री... हरदा अग्निकांड की पूरी इनसाइड स्टोरी


 Harda Firecracker Factory Explosion: गुस्साए, खौलते, चीखते, गरजते, तूफान के बाद धुआं-धुंआ माहौल और खौफनाक मंजर की खामोश तस्वीरें. आसमान से जमीन पर उस जगह को देखने से साफ है कि चारों तरफ खेत हैं और खेत के बीच में बहुत सारे घर.

घर यानि बस्तियां. और इन्हीं घर और बस्ती के बीच मौत की वो फैक्ट्री चल रही थी, जहां बारुद का जखीरा रखना मजबूरी या गैर कानूनी नहीं बल्कि कारोबार का एक हिस्सा था. अब पटाखों का कारोबार बगैर बारुद के तो चल नहीं सकता. लेकिन बस्ती के बीचो-बीच बारूद के ढेर पर बैठी फैक्ट्री जरूर चल सकती है और जब ऐसा होगा तो फिर ऐसे हादसे तो होंगे ही.

दस किलोमीटर तक सुनाई दी धमाके की गूंज
धुएं से पहले के धमाकों और शोलों की दहलाती तस्वीरें सामने आईं हैं. वो भी कैमरे के अलग-अलग एंगल से. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 150 किलोमीटर दूर हरदा है. लगभग 7 लाख की आबादी है उस शहर की. उसी हरदा में मंगलवार की सुबह लगभग 11 बजे एक जबरदस्त धमाके की आवाज गुंजती है. धमाके की गूंज इतनी ताकतवर थी की ना सिर्फ 10 किलोमीटर दूर तक उसकी गूंज सुनाई देती है बल्कि लोगों के घरों के शीशे, टिन, दरवाजे, बर्तन तक उड़ने लगते हैं.

धमाके में दूर तक उड़ गए लोग
कुछ पल के लिए तो शुरु में ऐसा लगा जैसे कोई बम ब्लास्ट हुआ है. लेकिन फिर जब इस इलाके से इस तरह शोले उठने लगे तो अंदाजा हो चुका था कि बारूद की इस फैक्ट्री में यानि पटाखे के कारखाने में धमाका हुआ है. जिस वक्त ये धमाका हुआ तब फैक्ट्री के अंदर और बाहर बहुत सारे लोग थे. कुछ लोगों को तो धमाका उड़ा कर दूर खेतों और सड़कों तक ले गया. दूर-दूर तक लोगों की लाशे पड़ी थीं. घायलों की तो तब गिनती भी मुमकिन नहीं थी. ऊपर से सितम ये कि पहले धमाके के बाद अगले कई मिनटों तक रूक रूक कर धमाके होते रहे. धमाके होते रहे और लोग बदहवास अपनी जान बचाने के लिए भागते रहे.

फैक्ट्री के साथ आग की चपेट में आए 60 से ज्यादा घर
पटाखे की उस फैक्ट्री में काम करने वाले बहुत से लोग फैक्ट्री के आस-पास ही रहा करते थे. फैक्ट्री के साथ साथ कई घरों में भी बारूद रखे हुए थे. फैक्ट्री से निकले शोले और चिंगारियां अब उड़-उड़ कर उन घरों तक पहुंच रही थी. देखते ही देखते फैक्ट्री के आस पासे के करीब 60 घर भी आग की चपेट में आ गए. जिन घरों में बारूद रखे थे अब वहां से धमाके गूंज रहे थे. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस हाल में वो क्या करें. फैक्ट्री के साथ साथ एक एक कर लगातार घर जल रहे थे.

धमाके के बाद घंटेभर तक नहीं पहुंची थी मदद
इस पूरे रास्ते में बहुत सारे लोग तब मौजूद थे. कुछ लोग उन फंसे लोगों को बचाना भी चाहते थे. लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि आग के शोलों में कूदे कैसे? हरदा जैसी छोटी जगह पर इतने बड़े हादसे से निपटने या मदद पहुंचाने के उतने इंतजाम भी नहीं थे. और मध्य प्रदेश के जिन दो शहरों भोपाल और इंदौर से फौरन मदद मिल सकती थी वो दोनों ही शहर हरदा से करीब करीब 150-150 किलोमीटर की दूरी पर थे. हादसे के बाद कायदे से अगले घंटे भर तक इन धमाकों और शोलों में फंसे लोगों तक किसी तरह की कोई मदद ही नहीं पहुंच पाई.

देर से पहुंची फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस
घायलों के लिए एंबुलेंस तो छोड़िए आग पर पानी डालने वाली फायर ब्रिगेड की गाड़ियां भी बहुत देर से पहुंची. और फिर जब पहुंची भी तो शोलों तक उनकी पहुंच ही नहीं हो पा रही थी. बाद में हर न्यूज चैनल पर जब हरदा की ये तस्वीरें तैरने लगी तब शायद सरकार और प्रशासन को लगा कि घायलों तक जल्दी मदद पहुंचनी चाहिए. आनन फानन में भोपाल, इंदौर और हरदा के आसपास के इलाकों से 100 से ज्यादा एंबुलेंस मौका-ए-वारदात पर भेजी गईं. भोपाल और इंदौर के बड़े अस्पतालों को अलर्ट किया गया.

बस्ती के बीच पटाखे की ये फैक्ट्री कैसे चल रही थी?
ज्यादा गंभीर लोगों को अस्पताल पहुंचाने के लिए हेलिकॉप्टर के वास्ते सेना से मदद मांगनी पड़ी. तब कहीं जाकर घायलों को बड़े अस्पतालों में इलाज मयस्ससर हुआ. हालाकि तब तक 11 लोग दम तोड़ चुके थे. और 60 से ज्यादा झुलस चुके थे. अब वापस उसी सवाल पर आते हैं कि बस्ती के ठीक बीचो बीच बारूद पर बैठी पटाखे की ये फैक्ट्री चल कैसे रही थी. ऐसा भी नहीं है कि ऐसी फैक्ट्रियों में ऐसे धमाके पहली बार हुए हैं. अब तक देश के अलग अलग राज्यों में पटाखों की सैकड़ों फैक्ट्रियो में धमाके हो चुके हैं. आग लग चुकी है. और सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.

अनफिट थी धमाके वाली फैक्ट्री
हरदा की जिस पटाखा फैक्ट्री में ये धमाका हुआ वो फैक्ट्री बैरागढ़ गांव में है. हादसे के बाद मौके पर पहुंचे हरदा एसडीएम ने कहा कि ये फैक्ट्री अनफिट थी. हालाकि इसके साथ-साथ वो ये भी कहते हैं कि एक महीने पहले जब इस फैक्ट्री की जांच की गई थी तब जांच रिपोर्ट ठीक पाया गया था. यानि महीने भर पहले तक ये फैक्ट्री फिट थी. अब अचानक ये अनफिट हो गई. हालाकि एसडीएम साहब के पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि फैक्ट्री के इर्द गिर्द गांव के घरों में बारूद कैसे रखे हुए थे.

कुछ दिन मचा शोर फिर सब थम गया
जाहिर है जांच का हवाला देकर इस हादसे को भी भुला दिया जाएगा और क्या पता कुछ वक्त बाद एक बार फिर से इसी जगह पर इसी फैक्ट्री को फिट करार देकर इसे फिर से चालू कर दिया जाए. क्योंकि इससे पहले अनगिनत बार ऐसा हो चुका है. फैक्ट्रियां खुद पटाखा बन कर फूट गईं. बस्तियों को स्वाहा कर गईं. कुछ दिन शोर मचा फिर सब थम गया.

तमिलनाडु के शिवाकाशी में बनते हैं सबसे ज्यादा पटाखें
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पटाखा बनाने वाला देश है. सिर्फ चीन हमसे आगे है. देश में सबसे ज्यादा पटाखे तमिलनाडु के शिवाकाशी में बनते हैं, जहां 8 हज़ार से ज्यादा फैक्ट्री हैं. भारत में लगभग 8 हजार करोड़ रुपये की पटाखा इंडस्ट्री है. देश में पटाखों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल दिवाली, शादियों और धार्मिक समारोह में किया जाता है. डायरेक्टली और इनडायरेक्टली इस इंडस्ट्री से 8 लाख से ज़्यादा लोग जुड़े हैं.

इस साल शादी के सीज़न में एक अनुमान के मुताबिक देश में दिवाली से ज्यादा पटाखों की बिक्री हुई. देश के अंदर पटाखों की सबसे ज्यादा बिक्री के मामले में महाराष्ट्र पहले नंबर पर, उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर, बिहार तीसरे नंबर पर और गुजरात चौथे नंबर पर है. मध्य प्रदेश की ज्यादातर पटाखा फैक्ट्रियां पटाखों को दूसरे राज्यों में भेजती हैं.

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